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Wednesday, 4 September 2013

Hindi Poem by Rajendra Nehra: Sham Ke Dhalne Ka Intezar Kar Lete Hain | शाम के ढलने का इंतजार कर लेते हैं...



शाम के ढलने का इंतजार कर लेते हैं,
खुद से भी बातें दो चार कर लेते हैं।

जानते हैं ये ठीक नहीं मगर फिर भी,
गुजरे वक्त को याद कभी-कभार कर लेते हैं।

यूं तो सोचा नहीं करते कभी कुछ करते,
पर कभी बैठते हैं सोच विचार कर लेते हैं।

जाने क्यों जाता है वो हंगामों के बाजार,
हम तो खुद को दर किनार कर लेते हैं।

वो लाया फिजिक्स की किताब और बोला,
आ बैठ राजू! कुछ पाठ तैयार कर लेते हैं।


(Author, my tukbandi)

3 comments:

  1. Kabhi Raju hum Se bhi baat chaar kar leta tha
    Aaj, samne aane par bhi ,aankhe chura leta h.

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  2. Kabhi Raju hum Se bhi baat chaar kar leta tha
    Aaj, samne aane par bhi ,aankhe chura leta h.

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