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Monday, 29 June 2015

A life poem by Raju Rajendra Nehra | अटपटी सी चटपटी जिंदगी...



अटपटी सी चटपटी जिंदगी,
रूकती-चलती फटफटी जिंदगी।

हिलती-डुलती हिचकोले खाती,
मचलती जाती, उछलती जाती।

दिनभर दौड़ती-भागती जिंदगी,
रातभर आंखों में जागती जिंदगी।

सुख, संताप, सुकून, बेकरारी,
कभी ख़बर है, कभी ख़ुमारी।

आकाश और चांद-तारों को तकती,
बच्चों जैसी मासूम, हठी जिंदगी।

भंवर-भंवर है भूल-भुलैया,
पतवार आप ही, आप खिवैया।

ठौर-ठिकाने आती-जाती जिंदगी,
समझती और समझाती जिंदगी।

मंजिले-मौत की डगर सुहानी,
कदम-कदम है नई कहानी।

हुआ हो कुछ भी, अपनी तो राजू!
ना डटी ना ही पीछे हटी जिंदगी।





*Image Source: Pixabay

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