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Thursday, 22 September 2016

Hindi Poem: The Ghazal


वैसे देखा जाए तो मेरी ये कविता कोई ग़ज़ल नहीं है, महज़ एक तुकबंदी है. फिर भी मैंने इसका शीर्षक 'The Ghazal' रखा है, और यही इसकी खासीयत है. तो पेश है 'The Ghazal'-


ना जाने उसकी आँखों में ऐसा क्या मिल गया,
हर किसी को अपनी ग़ज़ल का मतला मिल गया।

रात हुई और वो जगमगाती आंखें दीया बन गई,
अनजान किसी शायर के लिए काफ़िया बन गई।

किसी ने उन मतवाली आंखों को कह दिया सीप,
और शान से अपनी शायरी का कर लिया रदीफ़।

मासूमियत है, अदाएं हैं, हर मिसरे का नूर हैं वो,
जिसमें उनकी रौनक हो, ग़ज़ल बड़ी मशहूर है वो।

जब वो चले गए, हुश्न के बाज़ार में मंदी हो गई,
चलो मकता में राजू! अपनी भी तुकबंदी हो गई।

(Author, my tukbandi)